हमारे साथ खाइए
मोहम्मद रेस्तराँ
भारतीय, तिब्बती और अंतरराष्ट्रीय भोजन — तीर्थयात्रियों, मुसाफ़िरों और स्थानीय लोगों के लिए।

मोहम्मद रेस्तराँ · मोहम्मद गेस्ट हाउसतिब्बती मंदिर के पास · बोधगया
बोधगया में रेस्तराँ, गेस्ट हाउस और मिलने की जगह — 1996 से यहाँ आने वाले लोगों के साथ विकसित हुई।

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भारतीय, तिब्बती और अंतरराष्ट्रीय भोजन — तीर्थयात्रियों, मुसाफ़िरों और स्थानीय लोगों के लिए।
हमारे साथ ठहरिए
बोधगया के मंदिरों और तीर्थ जीवन के पास, सादा और स्वागतपूर्ण ठहरने की जगह।
हमारी कहानी
एक छोटा मौसमी रेस्तराँ ऐसी जगह बना जहाँ भोजन, दोस्ती और विचार दोनों दिशाओं में यात्रा करते रहे।
1996—आज

मोहम्मद ने बचपन में ही रेस्तराँ में काम शुरू किया। 1996 में, लगभग पंद्रह वर्ष की उम्र में, उन्होंने चार लोगों की टीम के साथ एक छोटा मौसमी रेस्तराँ खोला।
बोधगया में मिले मेहमान उन्हें फिर खोजते हुए आए। वे खाते, बातें करते, लौटते और दोस्तों को लाते। किसी ने व्यंजन सिखाया, किसी ने रसोई में हाथ बँटाया और किसी ने सेवा, सफ़ाई या थके तीर्थयात्री की ज़रूरतों पर सुझाव दिए। इसी रोज़ के मेल-जोल से मेनू बढ़ा और स्थानीय टीम ने इस छोटी जगह को स्थायी मिलन-स्थल बनाया।
उन शुरुआती मेहमानों में से बहुत से दुनिया भर में आगे बढ़ गए, लेकिन रिश्ता खत्म नहीं हुआ। उन्होंने दोस्तों को भेजा, वर्षों बाद लौटे और भोजन, स्वागत और मेज़ों के आसपास की बातचीत में अपनी यात्राओं के अंश पाए।
रेस्तराँ की सफलता से बाद में ज़मीन खरीदना और गेस्ट हाउस शुरू करना संभव हुआ। आज नई पीढ़ियाँ उन लोगों के साथ काम करती हैं जिन्हें शुरुआती दिन याद हैं—यह कहानी कभी केवल एक व्यक्ति की नहीं रही।
कई यात्राओं का भोजन
यह रसोई बोधगया आने वाले स्थानीय परिवारों, बौद्ध तीर्थयात्रियों, बैकपैकरों और लौटने वाले दोस्तों के साथ विकसित हुई। भोजन विविध, अनौपचारिक और मिल-बाँटकर खाने वाला है। केक और मीठे व्यंजन मोहम्मद के इतिहास का अहम हिस्सा बन गए। जब बोधगया में एप्पल पाई, चॉकलेट पुडिंग पाई और पैनकेक आसानी से नहीं मिलते थे, तब वे अनेक विदेशी तीर्थयात्रियों और लंबे समय तक ठहरने वाले मेहमानों को घर के स्वाद की छोटी-सी सुकूनभरी याद देते थे। व्यंजनों के साथ यादें भी रेस्तराँ तक पहुँचीं और इनमें से कुछ पकवान अपनी अलग परंपरा बन गए।
हर दिन खुला · सुबह 7:00 बजे–रात 10:00 बजे



ठहरने की सादी जगह
मोहम्मद गेस्ट हाउस में उसी पारिवारिक स्वागत के साथ सादा आवास मिलता है। कमरों की नई तस्वीरें, सुविधाएँ और कीमतें इस पेज के लिए तैयार की जा रही हैं।
कमरे की पूछताछहमारे आसपास
1990 के दशक में तीर्थ मौसम का बहुत सा जीवन धूल भरी गलियों, अस्थायी दुकानों और सादे भोजनालयों के आसपास चलता था। बोधगया का पवित्र महत्व प्राचीन था; उसकी नई अंतरराष्ट्रीय पहचान का अध्याय तभी खुल रहा था।
महाबोधि मंदिर परिसर 2002 में यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल हुआ। उसके आसपास एशिया के अनेक बौद्ध समुदायों के मंदिर और मठ सांस्कृतिक दूतावास जैसे हैं—हर एक अपने देश की वास्तुकला, भाषा, भोजन और जीवित परंपराएँ बोधगया लाता है।

बोधगया का हृदय और यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल।

पूरे नगर में तिब्बती, थाई, जापानी, भूटानी और दूसरी परंपराएँ मिलती हैं।

शिक्षाओं और तीर्थ के मौसम में एक प्रमुख सभा-स्थल।
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मोहम्मद रेस्तराँमिया बिघा · बोधगया · बिहार 824231 · भारत
मोहम्मद गेस्ट हाउसभानुमती रोड · मिया बिघा · बोधगया · बिहार 824231 · भारत
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